शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

3 लघुकथाएँ


 
डॉ. अंजु दुआ जैमिनी

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1. इत्मीनान

"यार! किस बेवकूफ ने शहर के बीचों-बीच शमशान बनवा दिया?"

"क्यों, क्या हुआ, तुम्हें क्या तकलीफ है?"

"कुछ नहीं यार, बस आते-जाते कोई-न-कोई - अर्थी दिख ही जाती है।"

"अरे यार! मृत्यु अंतिम सत्य है, इस सत्य से घबराना कैसा।"

"ठीक है लेकिन जिस दिन ऊपर की कमाई करके आता हूँ या कोई गलत काम करके आता हूँ और उस दिन अर्थी दिख जाती है तो मूड खराब हो जाता है, मृत्यु याद आ जाती है।"

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"हाँ, तो मत किया कर गलत काम, या रास्ता बदल लें।"

और अगले दिन उसने रास्ता बदल लिया।


2. शून्य-बोध

आदमी ने औरत से कहा- "सारा सामान बाँध लो, हम ये मोहल्ला छोड़ कर सोसायटी में अपने फ्लैट में शिफ्ट कर रहे हैं। ये जगह अब रहने लायक नहीं रही, नरक है नरक। यहाँ लोग छोटी-छोटी बात पर लड़ने लगते हैं, दम घुटता है मेरा।"

औरत ने सामान बाँध लिया और वे सोसायटी के शानदार फ्लैट में रहने लगे।

आदमी अपने भाग्य पर इतरा रहा था- "यहाँ सब कुछ है, कोई चिल्ल-पाँ नहीं।"

औरत के मुँह से एक भी शब्द नहीं फूटा और वह शून्य में घूरने लगी।


3. सुरक्षा

"अरी रधिया! तू अपनी बेटी को अपने साथ काम पर ले जाती है! ठीक है, पर सुना है तूने जवान बेटी को शर्मा के घर लगवाया है? तुझे नहीं पता कि उस शर्मा की नीयत ठीक नहीं है?" मुनिया बाई ने अपनी साथिन रधिया बाई से पूछा।

"जानती हूँ बहना, पर क्या करूं? कोई चारा भी


नहीं। घर पर उसे छोड़ती हूँ तो बाप-भाई बैठे हैं उसे खाने को, इसीलिए साथ ले आती हूँ। बीच-बीच में शर्मा के घर झाँक आती हूँ। कम-से-कम लड़की आँखों के सामने तो बनी रहती है।" रधिया बाई ठंडी साँस भरते हुए बोली।
-डॉ अंजु








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